रेडियो लेखन
रेडियो लेखन
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
रेडियो के लिए लिखते समय लेखक को इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि वह सुनने के लिए लिख रहा है। इसलिए बात बहुत साफ-सुथरे ढंग से तथा सरलतम रूप में कही जानी चाहिए। आँखों से देखने अर्थात् टेलीविजन के लिए लिखने में इतनी सावधानी की आवश्यकता नहीं होती है।
प्रत्येक भाषा के दो रूप होते हैं। पहला- उच्चारित और दूसरा- लिखित। उच्चारित शब्दों की शक्ति असीम है। लिखित शब्दों की शक्ति उनसे कुछ कम आँकी जाती है। रेडियो लेखन में भाषा को दोनों रूपों से होकर गुजरना पड़ता है। रेडियो लेखन में श्रोताओं की पसन्द को ध्यान में रखा जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। रेडियो के लिए लिखते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए
1. वाक्य छोटे और सरल करना चाहिए।
2. कठिन व अप्रचलित शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
3. दो वाक्यों को जोड़ने के लिए 'व' या 'तथा' के स्थान पर “और' का ही प्रयोग प्रचलित है।
4. रेडियो पर हर कार्यक्रम की समय-सीमा निर्धारित होती है इसलिए लिखते समय ध्यान रखना चाहिए कि आलेख निर्धारित समय में पूरा हो जाए।
5. क्षेत्रीय रुचि के कार्यक्रमों में क्षेत्र में प्रचलित कहावतों, प्रचलित शब्दों का प्रयोग रचना को सुन्दर और प्रभावी बनाता है।
रेडियो लेखन के सिद्धान्त के मुख्य तत्त्व हैं-
1. शब्द
2. ध्वनि प्रभाव (क्रिया ध्वनि, स्थल ध्वनियाँ, प्रतीक ध्वनियाँ )
3. संगीत
4. भाषा
5. रोचकता
6. संक्षिप्तता
7. नवीनता
8. श्रोता समुदाय की जानकारी
9. मौन या नि:शब्दता
'लिखित' शब्दों और 'बोले' हुए शब्दों में अन्तर होता है। उपयुक्त, उक्त, निम्नलिखित आदि शब्दों का लिखित भाषा में तो महत्त्व है, किन्तु बोले जाने वाले शब्दों में इनका महत्त्व खत्म हो जाता है।
रेडियो में ध्वनि-प्रभाव का अपना महत्त्व होता है। ध्वनियाँ ही दृश्य- चित्र के निर्माण में सहायक होती हैं। पक्षियों की चहक सुबह के आगमन को व्यक्त करती है। घोड़ों की टॉप की आवाज युद्ध क्षेत्र की कल्पना को उत्पन्न करती है। जिन बातों और दृश्यों को साकार करने में कई वाक्यों और शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, उन्हें रेडियो कुछ ही ध्वनियों के रिकॉर्डों के माध्यम से सुगमता से प्रस्तुत कर सकने में समर्थ है।
दरवाजे की दस्तकें, लाठी की ठक-ठक जैसी क्रियाओं की ध्वनियों का उपयोग भी रेडियो के पटकथाकार को करना होता है; जैसे- चीजों को जोर से पटकना व्यक्ति के क्रोध का प्रतीक है। किसी खास वातावरण का बोध कराने वाली ध्वनियाँ स्थल ध्वनियाँ कहलाती हैं; जैसे- गर्म चाय की आवाज, कुली-कुली की पुकार आदि, रेलवे स्टेशन की गहमा-गहमी का दृश्य साकार कर देती हैं।
नाटकीय स्थितियों के सृजन के लिए विशेष प्रतीकात्मक ध्वनियों का उपयोग किया जाता है। हास्य नाटिकाओं के बीच ठहाकों, युद्ध स्थल पर विस्फोटात्मक ध्वनियाँ और रोमेंटिक दृश्यों में झरनों की ध्वनियां व पक्षियों के चहचहाने की आवाजों का उपयोग रेडियो आलेख को सशक्त बनाता है।
रेडियो आलेख में संगीत का संयोग नाटकीयता को उभारने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। वातावरण बनाने, पात्र के भाव को उजागर करने और आलेख को गतिशील बनाने के लिए पटकथाकार संगीत का सहारा लेते हैं। रेडियो आलेख में संगीत का संयोग नाटकीयता को उभारने में उपयोगी होता है।
रेडियो की ध्वनियाँ भी श्रोता को बहुत देर तक बाँधकर नहीं रख सकती है। इसलिए रेडियो आलेख में बहुत छोटे-छोटे और बहुत सरल वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए।
रेडियो लेखन के स्वरूप
रेडियो पर अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। रेडियो का उपयोग ज्यादातर लोग समाचार और मनोरंजन के लिए करते हैं। इसके अलावा रेडियो का इस्तेमाल शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए भी किया जाता है।
भेंटवार्ता
भेंटवार्ता के अन्तर्गत किसी विषय पर उससे संबंधित व्यक्तियों से साक्षात्कार या एक से अधिक व्यक्तियों से चर्चा शामिल है। भेंटवार्ता में सूत्रधार को चर्चा के विषय की पूरी जानकारी होनी चाहिए। उसे वार्ता में शामिल लोगों की विशेषज्ञता के साथ ही उनकी मानसिकता का भी ध्यान रखना होता है। सूत्रधार को इस बात का ध्यान रखना होता है कि वार्ता विषय से भटके नहीं। भेंटवार्ता में वार्ताकार के व्यक्तित्व को उभारने पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
रेडियो वार्ता
यह भी भेंटवार्ता की ही तरह होती है। रेडियो वार्ता को सफल एवं बोधगम्य बनाने हेतु वार्ता के विषय की रोचकता के साथ-साथ सहज एवं सरल शैली का होना आवश्यक है, जिसमें विचारों को दृष्टान्तों के साथ समझाया गया हो। वार्ता में कठिन एवं साहित्यिक शब्दों से बचना चाहिए। वार्ता का लेखन और प्रस्तुतीकरण दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं। अत: लेखन और वाचन दोनों मिलकर ही वार्ता को सजीव एवं सफल बनाते हैं।
परिचर्चा एवं संवाद
परिचर्चा को विचारगोष्ठी कहा जा सकता है, अर्थात् विचार-विमर्श नियामक विषय एवं प्रतिभागियों का परिचय देकर जब परिचर्चा का प्रारम्भ करता है तो वह विषय का स्वरूप स्पष्ट करते हुए विषयगत एक प्रश्न को प्रतिभागियों के समक्ष रखता है तथा उस पर उनके विचार जानता है। इस प्रकार परिचर्चा का प्रारम्भ हो जाता है। यहाँ नियामक परिचर्चा को आगे बढ़ाने में एक कड़ी का कार्य करता है। परिचर्चा में विषय को सम्पूर्णता से प्रस्तुत करने एवं विचारों का सिलसिला बनाए रखने के लिए प्रतिभागी को नोट्स बना लेने चाहिए।
रेडियो नाटक व कहानी
रेडियो पर प्रसारित होने वाले नाटक व कहानी में वर्णित घटना, स्थान या व्यक्ति विवादास्पद नहीं होने चाहिए तथा व्यावसायिक वस्तुओं के नाम आदि के प्रयोग से भी बचा जाना चाहिए। रेडियो नाटक व कहानी में अश्लीलता की भी कतई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कहानी सरल एवं सुबोध भाषा में होनी चाहिए। रेडियो नाटक व कहानी का उद्देश्य मनोरंजन के साथ ही शिक्षा देना भी होता है इसलिए नाटक व कहानी लिखते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।
कविता
रेडियो समय-समय पर कविताओं के लिए नए एवं प्रतिष्ठित कवियों को आमन्त्रित करता है। कविताओं का प्रसारण काव्यपाठ एवं कवि गोष्ठी के रूप में किया जाता है। कविता के सन्दर्भ में भी विवादास्पद शब्दों एवं वाक्यों से बचना चाहिए। ऐसी कविताओं का रेडियो पर प्रसारण नहीं किया जा सकता, जो किसी विवाद को जन्म दें।
पत्रोत्तर
किसी भी कार्यक्रम के प्रति स्रोताओं की टिप्पणी या विचार जानने का सबसे अच्छा तरीका पत्रोत्तर कार्यक्रम होता है। इसमें स्रोताओं के पत्रों का उत्तर दिया जाता है।
हास्य - व्यंग्य
रेडियो में हास्य व्यंग्य का सदा से अभाव रहा है, क्योंकि व्यंग की आत्मा प्रहार में है लेकिन रेडियो सरकारी माध्यम होने के कारण जो किसी पर प्रहार करे ऐसे कार्यक्रम इसकी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। आजकल फिर भी कुछ खुलापन आया है और कुछ व्यंग्य वार्ताएँ प्रसारित होती है।
उदघोषणा या सूचना
किसी कार्यक्रम के बाद एक दो मिनट का समय बच जाता है तो उसका सदुपयोग आगे के कार्यक्रम के बारे में बताने में किया जाता है। उदघोषणा से स्रोताओं की कार्यक्रम में रुचि बढ़ती है अगर उसे सरल और रोचक तरीके से बताया जाता है।
रेडियो समाचार
रेडियो समाचार के लिए सरकारी व गैर सरकारी समाचार समितियों पर निर्भर रहते हैं। साथ ही रेडियो में सूचना की प्रमाणिकता पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाता है।


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