टीवी के लिए लेखन writing for TV programs
टीवी के लिए लेखन
डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज
टीवी लेखन कई विधाओं में किया जाता है। टीवी पर मुख्यरूप से दो तरह के कार्यक्रम अधिक होते हैं, समाचार व मनोरंजन कार्यक्रम।
समाचारों में सामान्य समाचारों के अलावा टॉक शो, पैनल डिस्कशन व साक्षात्कार भी शामिल हैं।
टॉक शो: यह टीवी का एक लोकप्रिय कार्यक्रम है। इसे कुछ लोग इंटरव्यू भी समझते हैं पर इंटरव्यू और टॉक शो में अंतर होता है। इंटरव्यू में साक्षात्कार लेने वाला प्रश्न करता है और साक्षात्कार देने वाला उन्हीं सवालों के दायरे में जवाब देता है। टॉक शो में साक्षात्कार देने वाला मेहमान कहलाता है। इसमें मेहमान बातचीत के दौरान अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में या दूसरे सन्दर्भों में भी अपनी बात कह सकता है। टॉक शो में बीच में वीडियो क्लिप या पुराने फोटोग्राफ्स का भी प्रयोग किया जा सकता है। साक्षात्कार एक तरह से सार्वजनिक विषय पर होता है जबकि टॉक शो व्यक्तिगत होता है। फारुख शेख के टॉक शो 'शख्सियत विथ फारुख शेख' और 'जीना इसी का नाम है' के अलावा 'कॉफी विद करण' मशहूर टॉक शो रहे हैं।
पैनल डिस्कशन: इसमें किसी एक विषय पर एंकर तीन-चार लोगों के साथ चर्चा करता है। वक्ताओं में विषय से सम्बंधित पक्ष व विपक्ष के लोग शामिल होते हैं। इस तरह के कार्यक्रम टीवी न्यूज चैनलों पर अक्सर आते हैं। इस कार्यक्रम को पूरी तरह से पहले से लिखना संभव नहीं होता। केवल एंकर के सवाल आदि पहले से लिखे होते हैं।
साक्षात्कार: इसमें किसी सामयिक विषय पर उससे सम्बंधित व्यक्ति से साक्षात्कार प्रमुख होता है। इसके अलावा टीवी पर चर्चित व्यक्तियों, लेखकों आदि के साक्षात्कार भी प्रसारित होते हैं। साक्षात्कार में भी पहले से केवल सवालों को ही लिखा जाता है। कई बार एंकर अपनी तरफ से भी तत्काल कोई प्रश्न पूछ लेता है।
मनोरंजन कार्यक्रमों में टीवी धारावाहिक, लघु फ़िल्म, वृत्तचित्र के साथ ही फैशन, सिनेमा, कला, संगीत, नृत्य आदि के कार्यक्रम शामिल रहते हैं।
टीवी लेखन में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
यह दृश्य व श्रव्य माध्यम है इसलिए चाहे समाचार हों या मनोरंजन कार्यक्रम, इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आप आंख और कान के लिए लिख रहे हैं।
कान व आंख के लिए लिखना और प्रिंट मीडिया के लिए लिखना एकदम अलग है। प्रिंट मीडिया में पाठक के पास किसी भी समाचार या लेख आदि को एक से अधिक बार पढ़कर समझने की सुविधा होती है। रेडियो और टीवी में यह सुविधा नहीं होती। टीवी में दर्शक जो कुछ देखता है और सुनता है उसे एकबार में ही समझना होता है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो कुछ कहा व दिखाया जाएगा वह एक बार में ही दर्शकों की समझ में आ जाए।
भाषा व चित्र में सम्बन्ध व तारतम्यता होनी चाहिए: टीवी दृश्य व श्रव्य माध्यम है इसलिए उसमें भाषा और विजुअल में सम्बन्ध होना चाहिए। जो कहा जा रहा है उससे विजुअल का तालमेल नहीं होने पर दर्शक कुछ समझ नहीं पाएगा। इससे वह भ्रमित भी हो सकता है। इसलिए टीवी के लिए लिखते समय लेखक को उसे एक चित्र के विवरण की तरह लिखना चाहिए।
भाषा सरल व संक्षिप्त होनी चाहिए: अन्य माध्यमों की तरह टीवी लेखन की भाषा भी सरल और संक्षिप्त होनी चाहिए। टीवी में कम समय में अधिक बात कहनी होती है जिसके लिए भाषा का संक्षिप्त होना जरूरी है। टीवी के दर्शकों में शिक्षित के साथ ही अशिक्षित या कम शिक्षित लोग भी होते हैं। समाचारों के अलावा मनोरंजन कार्यक्रम के भी सभी प्रकार के दर्शक होते हैं। इसलिए विशेष कार्यक्रमों, साहित्य आदि को, छोड़कर बाकी सभी कार्यक्रमों के लिए सरल भाषा में लिखना चाहिए।
बातचीत की शैली में लिखना चाहिए: टीवी के लिए लिखते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो कुछ लिखा जाए वह बातचीत की शैली में हो। इसे संवाद शैली भी कह सकते हैं। मनोरंजन कार्यक्रमों में तो संवाद होते ही हैं। समाचारों में भी कोशिश करनी चाहिए कि इस प्रकार से लिखा जाए कि दर्शकों को लगे कि वक्ता जैसे उनसे बात कर रहा है।
चरित्रों के अनुरूप भाषा का प्रयोग करना चाहिए: मनोरंजन कार्यक्रमों में चरित्रों के अनुरूप भाषा का प्रयोग करना चाहिए। इससे चरित्र अच्छी तरह उभर कर सामने आते हैं। दर्शकों पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है।
टीवी लेखन में साउंड इफेक्ट का भी ध्यान रखना चाहिए: टीवी में भाषा और विजुअल के साथ ही साउंड का विशेष महत्व होता है। इसलिए टीवी लेखन में कब कितने साउंड का प्रयोग किया जा सकता है इस बात का भी लेखक को ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए लेखन में नाटकीयता का इस्तेमाल किया जा सकता है।
समाचार को डायरेक्ट स्पीच यानी एक्टिव वाइस में लिखना चाहिए: टीवी के लिए लिखते समय किसी भी बात को डायरेक्ट स्पीच में लिखना चाहिए। किसी भी बात को घुमा- फिराकर लिखने पर कई बार बात स्पष्ट नहीं हो पाती। दर्शक भी कई बार सही अर्थ तक नहीं पहुँच पाता।
अनावश्यक विवरण व उद्धरणों को नहीं देना चाहिए: टीवी समाचार हों या मनोरंजन कार्यक्रम, उनमें अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए। टीवी लेखक को कम समय में अधिक बात कहनी होती है। इसलिए अनावश्यक विवरण को हटा देना चाहिए।
मनोरंजन कार्यक्रमों टीवी धारावाहिक, लघु फ़िल्म, वृत्तचित्र आदि के लेखन के लिए कथात्मक शैली का प्रयोग किया जाता है। धारावाहिक में कहानी को निर्धारित एपिसोड के अनुसार विभाजित करके लिखना होता है।


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