रिपोर्ताज लेखन

रिपोर्ताज लेखन डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज रिपोर्ताज और रिपोर्ट यानी समाचार को अक्सर एक ही समझ लिया जाता है। इसका एक बड़ा कारण दोनों का ही मूल कोई खबर होना है। रिपोर्ताज को सामान्य समाचार से अलग माना जाता है। एक सामान्य समाचार में कोई भी रिपोर्टर किसी घटना या कार्यक्रम की जानकारी देता है। एक रिपोर्टर बगैर घटनास्थल पर जाए भी उस घटना की खबर लिख सकता है। वह प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर खबर लिख सकता है, पुलिस प्रेस नोट के आधार पर खबर लिख सकता है। यानी सामान्य समाचार लिखने के लिए रिपोर्टर का उस खबर से प्रत्यक्ष संपर्क में आना जरूरी नहीं होता। इसके विपरीत रिपोर्ताज का अर्थ होता है ऐसा समाचार जो रिपोर्टर ने अपने प्रत्यक्ष अनुभव से लिखा है। संवाददाता ऐसी खबरों को लिखते समय अपने अनुभव को प्रमुख आधार बनाता है। वह घटनास्थल की सम्पूर्ण जानकारी देता है, वहां के वातावरण, आसपास के लोगों के बारे में जानकारी देता है। वह घटना के तत्कालिक प्रभाव को भी लिखता है। वह आवश्यकतानुसार वहां उपस्थित लोगों का संक्षिप्त साक्षात्कार भी लेता है जिसमें वह लोगों की राय प्राप्त करता है। इस प्रकार रिपोर्ताज एक प्रकार से विस्तृत समाचार बन जाता है। टीवी और रेडियो में रिपोर्ताज लेखन का अधिक प्रयोग होता है। विशेषरूप से टीवी समाचारों में जब कोई रिपोर्टर घटनास्थल से रिपोर्टिंग करता है, यानी लाइव रिपोर्ट करता है तो वह एक तरह का रिपोर्ताज ही होता है। रेडियो और टीवी में अक्सर संवाददाता किसी कार्यक्रम की लाइव रिपोर्टिंग करते समय वहां उपस्थित लोगों से बात भी करता है। रिपोर्ताज लिखते समय ध्यान रखने वाले बिंदु 1. रिपोर्ताज लिखते समय लेखक को उस विषय पर अपना दृष्टिकोण पहले बना लेना चाहिए ताकि वह अपनी रिपोर्ट को इच्छित दिशा दे सके। 2. एक समाचार पत्र या पत्रिका और रेडियो- टीवी के रिपोर्ताज में अंतर यह होता है कि अखबार व पत्रिका में वह हमेशा भूतकाल में होता है जबकि रेडियो व टीवी में वह हमेशा वर्तमानकाल में लिखा जाता है। 3. यदि रिपोर्ताज में लोगों से बातचीत की गई है तो उन्हें बिना किसी छेड़छाड़ के प्रकाशित करना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में लोगों की बात सीधे प्रसारित होती है जबकि अखबार में प्रकाशन बाद में होता है। अखबार के लिए रिपोर्ताज लिखते समय लेखक लोगों की बातों को संपादित कर सकता है। 4. रिपोर्ताज की भाषा हमेशा जीवंत होनी चाहिए। पाठक को लगना चाहिए कि वह घटनास्थल पर है। टीवी में सुविधा होती है कि दर्शक सीधे घटनास्थल को देख रहा होता है पर अखबार व पत्रिका में ऐसा नहीं होता। ऐसी स्थिति में लिखित सामग्री के साथ उपयुक्त चित्रों का प्रयोग करना चाहिए।

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