रचनात्मक लेखन creative writing

क्रिएटिव राइटिंग रचनात्मक लेखन

डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज

कोई भी जानकारी, विचार, भाव, अनुभव आदि जब सामान्य तरीके से न लिखकर विशेष तरीके से अधिक प्रभावशाली तरीके से लिखा जाता है तो उसे रचनात्मक या सृजनात्मक लेखन कहते हैं। सृजन या रचना का अर्थ ही है कुछ नया करना। इस नया करने में लेखक की अपनी ज्ञान, भाषा और अभिव्यक्ति क्षमता की मुख्य भूमिका होती है। मूलतः रचनात्मक लेख साहित्य का विषय है पर जैसा कि आप जानते हैं कि साहित्य पत्रकारिता या जन संचार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। 
रचनात्मक लेखन एक प्रकार से व्यक्तिगत लेखन होता है पर उसका उद्देश्य सार्वजनिक अभिव्यक्ति होता है। इसे निजी या व्यक्तिगत लेखन इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें लेखक अपनी शैली में लेखन करता है। लेखक की निजी पसंद, ज्ञान व भाषा पर अधिकार रचनात्मक लेखन में महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसी से प्रत्येक लेखक के लेखन की विशिष्टता प्रकट होती है। 
जन संचार माध्यमों में सबसे अधिक समाचार और विचार लेखन होता है, पर इसके साथ ही उसमें बहुत सारा लेखन ऐसा होता है जो समाचारों का हिस्सा नहीं होता। इस लेखन में ज्यादातर वह विधाएं शामिल हैं जो मनोरंजन व व्यक्तित्व विकास से सम्बंधित हैं। कविता, कहानी, निबंध आदि जीवन में आंनद का संचार करते हैं पर साथ ही व्यक्तित्व का विकास भी करती हैं। 
रचनात्मक लेखन का उद्देश्य  मनोरंजन करने के साथ ही मानवीय भावनाओं और अनुभवों को दूसरों के साथ बांटना भी है। रचनात्मक लेखन में लेखक अपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अनुभवों-जानकारियों के आधार पर जो रचता है उससे पाठकों के अनुभव संसार का विस्तार होता है। जन संचार माध्यमों यानी मास मीडिया का उद्देश्य लोगों के जीवन का बहुआयामी विकास है। इसीलिए उसमें समाचार सम्बन्धी लेखन के साथ ही रचनात्मक लेखन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 
रचनात्मक लेखन के प्रकार
कविता
कहानी व उपन्यास
नाटक
फ़िल्म व टीवी पटकथा
गीत
संस्मरण (मेमोरिज)
निबंध
फीचर 
भाषण
विज्ञापन: वैसे तो विज्ञापन भी रचनात्मक लेखन है पर वह व्यावसायिक लेखन की श्रेणी में आता है। इसीलिए उसे रचनात्मक लेखन के अध्ययन में शामिल नहीं किया जाता है। 

रचनात्मक लेखन की तकनीक और प्रक्रिया
रचनात्मक लेखन सामान्य लेखन से अलग होता है इसीलिए उसमें लेखन के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना होता है। कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण आदि का चरित्र कथात्मक होता है। उनमें मूलतः चरित्रों के माध्यम से कथा का विस्तार होता है। इसके विपरीत कहानी, निबंध, गीत आदि में भावों व विचारों की प्रधानता होती है। इसलिए उनके लेखन में भाव व विचार एक तरह से चरित्रों की भूमिका निभाते हैं। एक सामान्य प्रक्रिया के तहत हम रचनात्मक लेखन के लिए निम्नलिखित बिंदुओं को महत्वपूर्ण मान सकते हैं। 
कथानक का विकास (प्लॉट डवलपमेंट) रचनात्मक लेखन मूलतः कथात्मक लेखन है इसलिए यह जरूरी है कि कहानी का सही दिशा में व पूरा विकास हो। इसका अर्थ है कि कहानी की शुरुआत स्वाभाविक हो, वह सही क्रम में आगे बढ़े और उसका अंत वास्तविक लगते हुए लेखन के उद्देश्य को स्थापित करे। 
चरित्र विकास (करेक्टर डवलपमेंट) रचनात्मक लेखन में ज्यादातर लेखन कथात्मक होता है। प्रत्येक कथा या कहानी में कुछ पात्र या चरित्र होते हैं। इसलिए रचनात्मक लेखन में इस बात का ध्यान रखना जरुरी है कि कहानी के जो भी पात्र हैं, चाहे वह मानवीय हों, जगहों के रूप में हों या वस्तुओं के रूप में, उनका समुचित विकास होना चाहिए। अविकसित या अधूरे चरित्र लेखन को प्रभावहीन बना देते हैं। 
सजीव लेखनः रचनात्मक लेखन की एक विशेषता उसका सजीव होना होना है। रचना के पात्र व घटनाएं स्वाभाविक होने चाहिएं। उन्हें इस तरह से लिखा जाना चाहिए कि पाठक को वह वास्तविक और जीवंत लगें। पाठक को लगातार यह अनुभव होना चाहिए कि वह सभी घटनाओं को अपने सामने होता हुआ देख रहा है। सिनेमा व टेलीविजन में यह काम विजुअल की वजह से बहुत आसान हो जाता है पर प्रिंट मीडिया, रेडियो आदि में यह कार्य भाषा व विवरण से ही संभव हो पाता है। इसीलिए रचनात्मक लेखन की भाषा का सजीव या जीवंत होना एक प्रमुख गुण माना जाता है। 
अंतर्निहित विषय और उपाख्यानः रचनात्मक लेखन में इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि उसमें जो अंतर्निहित विषय व उपाख्यान यानी सहायक व समानांतर कहानियां हैं उनका भी समुचित विकास हो। उन्हें मूल कहानी में उचित महत्व दिया जाना चाहिए। अंतर्निहित विषय और उपाख्यान मूल कहानी के विकास के लिए जरूरी होते हैं। 
दृष्टिकोणः रचनात्मक लेखन एक तरह से व्यक्तिगत लेखन होता है यानी उसमें लेखक की निजी भावनाएं व विचार, और उसके अपने अनुभव मुख्य तत्व होते हैं। इसलिए लेखक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसका दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट हो और पाठक को साफ-साफ समझ में आ जाए। 
संवादः सभी प्रकार के रचनात्मक लेखन में संवाद की आवश्यकता नहीं होती। नाटक, कहानी, उपन्यास, सिनेमा, टीवी आदि में ही संवाद होते हैं। इसलिए लेखक को यह ध्यान रखना चाहिए कि संवाद प्रभावशाली, चरित्रों के अनुकूल और कथानक को दिशा देने वाले हों। संवादों की भाषा व रचना पात्रों के अनुरूप होनी चाहिए पर साथ ही इस बात का ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि वह पाठकों-दर्शकों की समझ में आसानी से आएं। शेष सभी प्रकार के रचनात्मक लेखन में संवादों की आवश्यकता नहीं होती पर यह माना जाता है कि उनमें भी लेखन इस तरह से किया जाना चाहिए कि संपूर्ण लेखन पाठकों से संवाद करता प्रतीत हो। इसका अर्थ है कि लेखन पाठकों को संबोधित किया जाता अनुभव होना चाहिए। इससे पाठक लेखन से आसानी से जुड़ जाता है।  
भाषिक सौंदर्यः रचनात्मक लेखन में भाषिक सौंदर्य का अत्यधिक महत्व है। भाषिक सौंदर्य से तात्पर्य है ऐसी भाषा से है जो पढ़ने-सुनने में रुचिकर हो और जो पाठकों में सौंदर्यबोध का विस्तार करे। भाषिक सौंदर्य लेखन को आकर्षक और सुग्राह्य बनाता है। इसके लिए लेखक विभिन्न अलंकारों, प्रतीकों, बिंबों, मुहावरों व लोकोक्तियों आदि का प्रयोग करता है। आजकल रचनात्मक लेखन की भाषा में न्यू मीडिया में प्रयोग किये जाने वाले एब्रिवेशन यानी शब्दों के संक्षिप्त रूप का प्रयोग किया जा रहा है। इसके साथ ही लोकप्रिय प्रतीकों व शब्द-युग्मों का भी प्रयोग किया जा रहा है। इससे वह युवाओं में अधिक ग्राह्य हो रहा है।  
कल्पनाः रचनात्मक लेखन में कल्पना का विशेष स्थान है। ज्यादातर रचनात्मक लेखन कथात्मक होता है। प्रत्येक कहानी के कुछ यथार्थ व सांसारिक संदर्भ होता हैं। यानी कहानी का आधार यथार्थ होता है जिसे लेखक अपनी कल्पना का सहारा लेकर अर्थ का विस्तार करता है। सामान्य पत्रकारीय लेखन पूरी तरह तथ्यात्मक व यथार्थवादी होता है। इसके विपरीत रचनात्मक लेखन निजी भावो-विचारों की अभिव्यक्ति होता है जिसके लिए लेखक यथार्थ तथ्यों को अपनाते हुए उसे कल्पना के नया आयाम देता है। 
भावनात्मक प्रभावः रचनात्मक लेखन में लेखक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पढ़ने, देखने और सुनने वालों पर समुचित भावनात्मक प्रभाव हो। यह भावनात्मक प्रभाव कविता, कहानी, सिनेमा आदि में अधिक आवश्यक हो जाता है क्योंकि इन लेखनों में लेखक का प्रमुख उद्देश्य लोगों को अपनी भावनाओं और विचारों से प्रभावित करना होता है। इसलिए यह जरूरी है कि लेखन का पाठकों, दर्शकों व श्रोताओं पर भावनात्मक प्रभाव अवश्य हो। इसके लिए लेखक को ऐसी घटनाओं, प्रतीकों, रूपकों आदि का सहारा लेना चाहिए जो लोगों के जीवन से सीधे जुड़े हैं और उन्हें आसानी से समझ में आते हैं। 
विस्तृत विवरणः रचनात्मक लेखन में कविता व गीत में ही कम शब्दों में अधिक बात कहने की आवश्यकता होती है। अन्य तरह के लेखन में विस्तार से लिखे जाने की पूरी संभावना होती है। इसीलिए रचनात्मक लेखन करते समय लेखक विस्तार से लिखनें में संकोच नहीं करना चाहिए। यह सही है कि आज लोगों के पास समय की कमी होती है। इसीलिए वह कम शब्दों का लेखन अधिक पसंद करते हैं। किस तरह के लेखन में कितना संक्षिप्तिकरण और विस्तार होना चाहिए यह उस लेखन के विषय की आवश्यकता पर निर्भर करता है। कहानी, उपन्यास, संस्मरण आदि में विस्तार की आवश्यकता होती है। सिनेमा व टीवी लेखन में विस्तार से अधिक गहनता की जरूरत होती है जो विस्तृत विवरण की दूसरा रूप है।  

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